15 August Speech..!!
15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश साम्राज्य से देश की आजादी की याद में भारत में हर वर्ष 15 अगस्त के दिन स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। इस दिन पूरे देश में राष्ट्रीय अवकाश होता है।
भारत को काफी बड़े पैमाने पर अहिंसक प्रतिरोध करने के बाद स्वतंत्रता की प्राप्ति हुई थी। प्रत्येक वर्ष स्वतंत्रता दिवस के दिन, भारत के प्रधान मंत्री पुरानी दिल्ली के लाल किले पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं, तथा भाषण देते हैं। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भारत के सभी स्कूल कॉलेज, तथा सरकारी दफ्तरों में, झंडारोहण समारोह, परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
भारत की स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीयों का आन्दोलन दो प्रकार का था — पहला अहिंसक आन्दोलन एवं दूसरा हिंसक क्रान्तिकारी आन्दोलन। पहला भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन सन् 1857 ई. से प्रारंभ होकर भारत की आज़ादी तक, यानी 15 अगस्त 1947 तक चला। भारत की आज़ादी के लिए 1757 से 1947 के बीच जितने भी संघर्ष हुए, उनमें वीरगति को प्राप्त स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानियां भारतीयों लोगो के लिए सबसे अधिक प्रेरणादायी सिद्ध हुई।
भारतीय स्वंतत्रता आंदोलन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग है। देश के प्रति जितनी भक्ति और मातृ-भावना लोगों के मन में उस युग में थी, उतनी शायद ही कभी हुई हो या हो पाए। अपने देश की सेवा और उसके लिए मर-मिटने की जो भावना उस समय लोगों में थी, वह आज के लोगों में देखने को नहीं मिलती।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सशस्त्र दलों की विशेषता यह रही, कि क्रांतिकारियों का स्वतंत्रता आंदोलन कभी शिथिल नहीं हुआ। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में क्रांतिकारियों का योगदान वाकई में अतुलनीय रहा है।
परन्तु दुर्भाग्य से भारत की स्वतंत्रता के बाद तब के भारतीय नेताओं ने भारत के सशस्त्र क्रान्तिकारियों के योगदान को प्रायः दबाने का काम किया। इतना ही नहीं, उन्हें भारतीय इतिहास में भी कम महत्व दिया गया।
भारत की स्वतंत्रता के उपरांत भारत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार बनी, अतः कांग्रेसी नेताओं द्वारा यह सिद्ध करने की पूर्ण चेष्टा की गई कि भारत को स्वतंत्र कराने में केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान रहा है, और भारत को स्वतंत्रता केवल कांग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों से ही मिली है। उन सभी असंख्य क्रांतिकारियों जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राण गवाए, तथा वीरगति को प्राप्त हुए की पूर्ण रूप से उपेक्षा कर दी गई।
भारत में अंग्रेज़ी शासकों के आगमन के साथ ही सशस्त्र क्रांतिकारियों का विद्रोह भी आरम्भ हो चुका था। प्रारंभ में क्रांतिकारियों द्वारा किए गए विद्रोह में बंगाल का सैनिक-विद्रोह, चुआर विद्रोह, संन्यासी विद्रोह, संथाल विद्रोह, प्रमुख थे।
भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा किए गए विद्रोह अनियोजित नहीं थे, बल्कि भारत माता के वीर सपूतों द्वारा उनके सम्मान की रक्षा में उठाए गए पूरी तरह से नियोजित कदम थे, जिसे उन्होंने देश की रक्षा के लिए अपना कर्तव्य समझकर उठाया था। भारतीय क्रांतिकारियों का उद्देश्य अंग्रेजों को नुक़सान पहुंचना या उनका रक्त बहाना नहीं था, अपितु वे अपने देश का सम्मान लौटाना चाहते थे।
परन्तु दुर्भाग्यवश भारत की आज़ादी के बाद सत्ता के लोभियों ने उन्ही से उनका सम्मान छीन लिया। जिन शहीदों और क्रांतिकारियों के प्रयासों व त्यागो से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें ही उनका उचित सम्मान नहीं मिल सका। बहुत से स्वतंत्रता सेनानियों को भारत की आज़ादी के बाद भी गुमनामी की ज़िन्दगी बितानी पड़ी।
किंतु निराशा में भी आशा की किरण यह है कि लाख कोसिस के वाबजूद भी कांग्रेसी नेता सामान्य जनता के मन में क्रांतिकारियों की छवि को धूमिल नहीं कर सके, और आज भी भारत के लोगों में उनके प्रति सम्मान की भावना जागृत है।
दोस्तो, हम भारतीय क्रांतिकारियों के साथ हुई नाइंसाफी को तो नहीं बदल सकते, परन्तु उनकी कुर्बानियों की गाथा अपनी अगली पीढ़ी तक तो जरूर पहुंचा सकते है, ताकि हमारी आने वाली पीढियों में भी उन क्रांतिकारियों के प्रति सम्मान की भावना रहे, जिन्होंने अपनी जान देकर हमें आज़ादी दिलाई है।
|
Post a Comment
Post a Comment