अटल बिहारी वाजपेई जी की देश-भक्ति कविताएं

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अटल बिहारी वाजपेई



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Geet Nahin Gata Hoon - Atal Bihari Vajpayee Kavita Pahli anubhuti - geet nahin gata hun Benakab chehre hain daag bade gehre hain, Tut'ta telism aaj se sach se bhay nahin khata hun.  Lagi kuch aisi nazar tut'ta sishe as sahar Apno ke mele me meet nahi pata main Geet nahin gata hoon. Pith me sa chand raahu gaya rekha fand Mukti ki chhaon mein bar bar band ho jata hun Geet nahin gata hoon.  Dusri Anubhuti - Geet Naya Gaata Hoon  Toote hue taaron se puche basanti sawar Pathar ki chhati mein ug aaya nav ankur Jhare sab pile pat koyal ki kuhuk raat  Prachi me arunim ki rekh dekh pata hun Geet naya gaya hun.  Tute huye sapnon ki kon sune shiski Antar ki chhir wytha palkon ki thitki Haar nahi manunga, raar nahi thanunga.  Kaal ke kapal pe likhta mit'ta hun Geet naya gaata hun.

गीत नहीं गाता हूँ - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

पहली अनुभूति: गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं, दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

लगी कुछ ऐसी नज़र, बिखरा शीशे सा शहर
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

पीठ मे छुरी सा चांद राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

दूसरी अनुभूति: गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बसंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ ।।





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क़दम मिला कर चलना होगा - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  बाधाएँ आती हैं आएँ घिरें प्रलय की घोर घटाएँ, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ, निज हाथों में हँसते-हँसते, आग लगाकर जलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा।  हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में, अगर असंख्यक बलिदानों में, उद्यानों में, वीरानों में, अपमानों में, सम्मानों में, उन्नत मस्तक, उभरा सीना, पीड़ाओं में पलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा।  उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में, बीच धार में, घोर घृणा में, पूत प्यार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में, जीवन के शत-शत आकर्षक, अरमानों को ढलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा।  सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ, प्रगति चिरंतन कैसा इति अब, सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ, असफल, सफल समान मनोरथ, सब कुछ देकर कुछ न मांगते, पावस बनकर ढ़लना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा।  कुछ काँटों से सज्जित जीवन, प्रखर प्यार से वंचित यौवन, नीरवता से मुखरित मधुबन, परहित अर्पित अपना तन-मन, जीवन को शत-शत आहुति में, जलना होगा, गलना होगा। क़दम मिलाकर चलना होगा।

क़दम मिला कर चलना होगा - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।





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आओ फिर से दिया जलाएँ - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  आओ फिर से दिया जलाएँ भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाईं से हारा अंतरतम का नेह निचोड़ें बुझी हुई बाती सुलगाएँ... आओ फिर से दिया जलाएँ..!!  हम पड़ाव को समझे मंज़िल लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल वतर्मान के मोह जाल में आने वाला कल न भुलाए... आओ फिर से दिया जलाएँ..!!  आहुति बाकी यज्ञ अधूरा अपनों के विघ्नों ने घेरा अंतिम जय का वज़्र बनाने नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ... आओ फिर से दिया जलाएँ..!!

आओ फिर से दिया जलाएँ - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अंधियारा
सूरज परछाईं से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें
बुझी हुई बाती सुलगाएँ...
आओ फिर से दिया जलाएँ..!!

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल
वतर्मान के मोह जाल में
आने वाला कल न भुलाए...
आओ फिर से दिया जलाएँ..!!

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ...
आओ फिर से दिया जलाएँ..!!





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जो बरसों तक सड़े जेल में - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें। जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें। याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को, कोल्हू में जुट तेल पेरते, सावरकर से बलिदानी को। याद करें बहरे शासन को, बम से थर्राते आसन को, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू के आत्मोत्सर्ग पावन को। अन्यायी से लड़े, दया की मत फरियाद करें। उनकी याद करें।  बलिदानों की बेला आई, लोकतंत्र दे रहा दुहाई, स्वाभिमान से वही जियेगा जिससे कीमत गई चुकाई, मुक्ति माँगती शक्ति संगठित, युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित, कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत। अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में क्यों अवसाद करें? उनकी याद करें..!!

जो बरसों तक सड़े जेल में - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें।
जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें।
याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को,
कोल्हू में जुट तेल पेरते, सावरकर से बलिदानी को।
याद करें बहरे शासन को, बम से थर्राते आसन को,
भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू के आत्मोत्सर्ग पावन को।
अन्यायी से लड़े, दया की मत फरियाद करें।
उनकी याद करें।

बलिदानों की बेला आई, लोकतंत्र दे रहा दुहाई,
स्वाभिमान से वही जियेगा जिससे कीमत गई चुकाई,
मुक्ति माँगती शक्ति संगठित, युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित,
कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत।
अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में क्यों अवसाद करें?
उनकी याद करें..!!



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राह कौन सी जाऊँ मैं - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? राह कौन सी जाऊँ मैं?  सपना जन्मा और मर गया, मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं?  दो दिन मिले उधार में, घाटों के व्यापार में क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं ।।

राह कौन सी जाऊँ मैं - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर
चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

सपना जन्मा और मर गया, मधु ऋतु में ही बाग झर गया
तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं?

दो दिन मिले उधार में, घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
राह कौन सी जाऊँ मैं ।।



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मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  ठन गई…! मौत से ठन गई !!  जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,   रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।   मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।   मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?  तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।  मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।  बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।  प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।  हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।  आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।  पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।  मौत से ठन गई।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

ठन गई…! मौत से ठन गई !!

जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। 

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

 मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।



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हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार..!!  रणचंडी की अतृप्त प्यास मैं दुर्गा का उन्मत्त हास मैं, यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार, फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती में आग लगा दूं मैं..!! यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय, हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय..!!  मैं आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर पय पीकर, सब मरते आए मै अमर हुआ..!! लो विष पीकर अधरों की प्यास बुझाई है मैंने, पीकर वह आग प्रखर हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको, पल भर मे ही छूकर भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन..!! मैं नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय, हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय..!!  मैं अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान मैंने दिखलाया, मुक्तिमार्ग मैंने सिखलाया, ब्रह्म ज्ञान मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर, मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर मेरा स्वर्णभ मे गेहर-गेहेर सागर के जल मे चेहेर-चेहेर इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मैं हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय!!  मैं तेजः पुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया मैंने प्रकाश जगती का रच करके विनाश कब चाहा है निज का विकास शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर यदि आज देहलि के खण्डहर सदियों की निद्रा से जगकर गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय,,, हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय॥  दुनिया के वीराने पथ पर जब-जब नर ने खाई ठोकर दो आँसू शेष बचा पाया जब-जब मानव सब कुछ खोकर मैं आया तभि द्रवित होकर, मैं आया ज्ञान दीप लेकर भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥  मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तः स्थल वर विशाल जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट यदि इन चरणों पर झुक जा वह किरिट तो क्या विस्मय हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय..!!  मैं वीर पुत्र मेरी जननी के जगती में जौहर अपार अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हे मीना बाजार क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलने वाली आग प्रखर जब हाय सहस्त्रो मताए तिल-तिल कर जल कर हो गई अमर वह बुझनेवाली आग नही रग-रग मे उसे समाए हूं यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय..!!  होकर स्वतंत्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम गोपाल राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया कब दुनिया को हिन्दु करने घर-घर मे नर संहारर किया कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी भूभाग नही शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय!!  मैं एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज मेरा इसका संबद्ध अमर मैं व्यक्ति और यह है समाज इससे मैने पाया तन-मन इससे मैने पाया जीवन मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण मैं तो समाज की थाति हूं मैं तो समाज का हूं सेवक मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय!!  जो बरसों तक सड़े जेल में - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  जो बरसों तक सड़े जेल में, उनकी याद करें। जो फाँसी पर चढ़े खेल में, उनकी याद करें। याद करें काला पानी को, अंग्रेजों की मनमानी को, कोल्हू में जुट तेल पेरते, सावरकर से बलिदानी को। याद करें बहरे शासन को, बम से थर्राते आसन को, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू के आत्मोत्सर्ग पावन को। अन्यायी से लड़े, दया की मत फरियाद करें। उनकी याद करें।  बलिदानों की बेला आई, लोकतंत्र दे रहा दुहाई, स्वाभिमान से वही जियेगा जिससे कीमत गई चुकाई, मुक्ति माँगती शक्ति संगठित, युक्ति सुसंगत, भक्ति अकम्पित, कृति तेजस्वी, घृति हिमगिरि-सी मुक्ति माँगती गति अप्रतिहत। अंतिम विजय सुनिश्चित, पथ में क्यों अवसाद करें? उनकी याद करें..!!  राह कौन सी जाऊँ मैं - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? राह कौन सी जाऊँ मैं?  सपना जन्मा और मर गया, मधु ऋतु में ही बाग झर गया तिनके टूटे हुये बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं?  दो दिन मिले उधार में, घाटों के व्यापार में क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं? राह कौन सी जाऊँ मैं ।।

हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय - अटल बिहारी वाजपेयी कविता


मैं शंकर का वह क्रोधानल कर सकता जगती क्षार-क्षार डमरू की वह प्रलयध्वनि हूं जिसमे नचता भीषण संहार..!!

रणचंडी की अतृप्त प्यास मैं दुर्गा का उन्मत्त हास मैं, यम की प्रलयंकर पुकार जलते मरघट का धुँवाधार, फिर अंतरतम की ज्वाला से जगती में आग लगा दूं मैं..!! यदि धधक उठे जल थल अंबर जड चेतन तो कैसा विस्मय, हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय..!!

मैं आज पुरुष निर्भयता का वरदान लिये आया भूपर पय पीकर, सब मरते आए मै अमर हुआ..!! लो विष पीकर
अधरों की प्यास बुझाई है मैंने, पीकर वह आग प्रखर हो जाती दुनिया भस्मसात जिसको, पल भर मे ही छूकर भय से व्याकुल फिर दुनिया ने प्रारंभ किया मेरा पूजन..!! मैं नर नारायण नीलकण्ठ बन गया न इसमे कुछ संशय, हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय..!!

मैं अखिल विश्व का गुरु महान देता विद्या का अमर दान मैंने दिखलाया, मुक्तिमार्ग मैंने सिखलाया, ब्रह्म ज्ञान मेरे वेदों का ज्ञान अमर मेरे वेदों की ज्योति प्रखर, मानव के मन का अंधकार क्या कभी सामने सकठका सेहर
मेरा स्वर्णभ मे गेहर-गेहेर सागर के जल मे चेहेर-चेहेर
इस कोने से उस कोने तक कर सकता जगती सौरभ मैं
हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय!!

मैं तेजः पुन्ज तम लीन जगत मे फैलाया
मैंने प्रकाश जगती का रच करके विनाश कब चाहा है
निज का विकास शरणागत की रक्षा की है मैने अपना जीवन देकर
विश्वास नही यदि आता तो साक्षी है इतिहास अमर
यदि आज देहलि के खण्डहर सदियों की निद्रा से जगकर
गुंजार उठे उनके स्वर से हिन्दु की जय तो क्या विस्मय,,,
हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय॥

दुनिया के वीराने पथ पर जब-जब नर ने खाई ठोकर
दो आँसू शेष बचा पाया जब-जब मानव सब कुछ खोकर
मैं आया तभि द्रवित होकर, मैं आया ज्ञान दीप लेकर
भूला भटका मानव पथ पर चल निकला सोते से जगकर
पथ के आवर्तोंसे थककर जो बैठ गया आधे पथ पर
उस नर को राह दिखाना ही मेरा सदैव का दृढनिश्चय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय॥

मैने छाती का लहु पिला पाले विदेश के सुजित लाल
मुझको मानव मे भेद नही मेरा अन्तः स्थल वर विशाल
जग से ठुकराए लोगों को लो मेरे घर का खुला द्वार
अपना सब कुछ हूं लुटा चुका पर अक्षय है धनागार
मेरा हीरा पाकर ज्योतित परकीयोंका वह राज मुकुट
यदि इन चरणों पर झुक जा वह किरिट तो क्या विस्मय
हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय..!!

मैं वीर पुत्र मेरी जननी के जगती में जौहर अपार
अकबर के पुत्रों से पूछो क्या याद उन्हे मीना बाजार
क्या याद उन्हे चित्तोड दुर्ग मे जलने वाली आग प्रखर
जब हाय सहस्त्रो मताए तिल-तिल कर जल कर हो गई अमर
वह बुझनेवाली आग नही रग-रग मे उसे समाए हूं
यदि कभी अचानक फूट पड़े विप्लव लेकर तो क्या विस्मय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय..!!

होकर स्वतंत्र मैने कब चाहा है कर लूं सब को गुलाम
मैने तो सदा सिखाया है करना अपने मन को गुलाम
गोपाल राम के नामों पर कब मैने अत्याचार किया
कब दुनिया को हिन्दु करने घर-घर मे नर संहारर किया
कोई बतलाए काबुल मे जाकर कितनी मस्जिद तोड़ी
भूभाग नही शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय
हिन्दु तन... मन हिन्दु... जीवन रग-रग हिन्दु मेरा परिचय!!

मैं एक बिन्दु परिपूर्ण सिन्धु है यह मेरा हिन्दु समाज
मेरा इसका संबद्ध अमर मैं व्यक्ति और यह है समाज
इससे मैने पाया तन-मन इससे मैने पाया जीवन
मेरा तो बस कर्तव्य यही कर दू सब कुछ इसके अर्पण
मैं तो समाज की थाति हूं मैं तो समाज का हूं सेवक
मैं तो समष्टि के लिए व्यष्टि का कर सकता बलिदान अभय
हिन्दु तन मन हिन्दु जीवन रग रग हिन्दु मेरा परिचय!!



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दुनिया का इतिहास पूछता - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  दुनिया का इतिहास पूछता, रोम कहाँ, यूनान कहाँ? घर-घर में शुभ अग्नि जलाता, वह उन्नत ईरान कहाँ है? दीप बुझे पश्चिमी गगन के, व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा, किन्तु चीर कर तम की छाती, चमका हिन्दुस्तान हमारा..!!  शत-शत आघातों को सहकर, जीवित हिन्दुस्तान हमारा जग के मस्तक पर रोली सा, शोभित हिन्दुस्तान हमारा..!!

दुनिया का इतिहास पूछता - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

दुनिया का इतिहास पूछता,
रोम कहाँ, यूनान कहाँ?
घर-घर में शुभ अग्नि जलाता,
वह उन्नत ईरान कहाँ है?
दीप बुझे पश्चिमी गगन के,
व्याप्त हुआ बर्बर अंधियारा,
किन्तु चीर कर तम की छाती,
चमका हिन्दुस्तान हमारा..!!

शत-शत आघातों को सहकर,
जीवित हिन्दुस्तान हमारा
जग के मस्तक पर रोली सा,
शोभित हिन्दुस्तान हमारा..!!



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पड़ोसी से - अटल बिहारी वाजपेयी कविता  अटल बिहारी वाजपेई जी की देश-भक्ति कविताएं  एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा..!!  अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता, अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता, त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता, दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता..!!  इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो, चिनगारी का खेल बुरा होता है..!! औरों के घर आग लगाने का जो सपना, वो अपने ही घर में सदा खरा होता है..!!  अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो, अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ..!! ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो, आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ..!!  पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है, तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई..!! अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं, माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई..!!  अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो..!! दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से, तुम बच लोगे यह मत समझो..!!  धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से, कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो..!! हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से, भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो..!!  जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार, अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष, स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे अगणित जीवन यौवन अशेष..!!  अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध, काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा..!! एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते, पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा..!!

पड़ोसी से - अटल बिहारी वाजपेयी कविता

एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा..!!

अगणित बलिदानो से अर्जित यह स्वतन्त्रता,
अश्रु स्वेद शोणित से सिंचित यह स्वतन्त्रता,
त्याग तेज तपबल से रक्षित यह स्वतन्त्रता,
दु:खी मनुजता के हित अर्पित यह स्वतन्त्रता..!!

इसे मिटाने की साजिश करने वालों से कह दो,
चिनगारी का खेल बुरा होता है..!!
औरों के घर आग लगाने का जो सपना,
वो अपने ही घर में सदा खरा होता है..!!

अपने ही हाथों तुम अपनी कब्र ना खोदो,
अपने पैरों आप कुल्हाडी नहीं चलाओ..!!
ओ नादान पडोसी अपनी आँखे खोलो,
आजादी अनमोल ना इसका मोल लगाओ..!!

पर तुम क्या जानो आजादी क्या होती है,
तुम्हे मुफ़्त में मिली न कीमत गयी चुकाई..!!
अंग्रेजों के बल पर दो टुकडे पाये हैं,
माँ को खंडित करते तुमको लाज ना आई..!!

अमरीकी शस्त्रों से अपनी आजादी को
दुनिया में कायम रख लोगे, यह मत समझो..!!
दस बीस अरब डालर लेकर आने वाली बरबादी से,
तुम बच लोगे यह मत समझो..!!

धमकी, जिहाद के नारों से, हथियारों से,
कश्मीर कभी हथिया लोगे यह मत समझो..!!
हमलो से, अत्याचारों से, संहारों से,
भारत का शीष झुका लोगे यह मत समझो..!!

जब तक गंगा मे धार, सिंधु मे ज्वार,
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष,
स्वातन्त्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष..!!

अमरीका क्या संसार भले ही हो विरुद्ध,
काश्मीर पर भारत का सर नही झुकेगा..!!
एक नहीं दो नहीं करो बीसों समझौते,
पर स्वतन्त्र भारत का निश्चय नहीं रुकेगा..!!



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